नमस्कार, “पंचमकार (Panchmakara)” साधना के विषय में मुझे एक प्राचीन पुस्तक में रुद्रयामल तंत्र (Rudrayamal Tantra) के ज्ञानमार्गोक्त पंचमकार-स्तोत्र को पढने का अवसर मिला ये पुस्तक डॉक्टर रुद्रदेव त्रिपाठी द्वारा लिखित है. उसी से लिया गया पाठ आपकी जानकारी हेतु यंहा प्रस्तुत है. रुद्रयामल तंत्र पुस्तक हिंदी में अमेजन पर उपलब्ध है .

वाममार्ग की साधना पद्धतियों से दीक्षा प्राप्त साधकों द्वारा “पंचमकार” (मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन) के समर्पण और सेवन का विधान तंत्र शास्त्रों में प्राप्त होता है आइये हम इसका आध्यात्मिक पक्ष जानने का प्रयास करते है.

रुद्रयामल तंत्र” के अनुसार “पंचमकार” का निर्देश सर्व साधारण के लिए ना होकर विशिष्ट साधकों के लिए विहित है और इनके समर्पण का अधिकार भी सभी को प्राप्त नहीं होता है.

ज्ञानमार्गोक्त पंचमकार-स्तोत्र

ज्ञानमार्गोक्त पंचमकार-स्तोत्र

रुद्रयामल‘ में इस सम्बन्ध में बहुत ही मार्मिक ढंग से साधक को सावधान करते हुए ‘ज्ञानमार्गोक्त पंचमकार-स्तोत्र’ कहा गया है। उसमें भगवती पार्वती शिवजी से प्रार्थना करती हैं कि हे जगन्नाथ, देव देव, प्रभु ! कृपा करके मुझे आगमोक्त मकारों को ज्ञानमार्ग से परिभाषित करके समझाइये।

तब शिव कहते हैं कि हे देवि ! सप्तदश कलाएं कही गई हैं और चन्द्रमा अमृत का स्रावण करता है, वही प्रथम मकार-मद्य है। शेष अन्य तो मदिरामात्र हैं

ज्ञान खड्ग के द्वारा कर्म और अकर्म रूप पशुओं का जो हनन करता है, वह द्वितीय मकार-मांस है। अन्य तो केवल मांसाहारी ही हैं।

मनरूपी मत्स्य का दमन करके व्यर्थ के संकल्पों को नष्टकर स्वरूपाकार वृत्ति का संकल्प करना तृतीय मकार-मत्स्य है। यही शुद्ध मीन कहलाता है, अन्य नहीं।

चतुर्थ मकार- मुद्रा वस्तुतः भक्ष्य, भोज्य, अन्न और इन्द्रियों का निग्रह है। जो लोग अन्य मुद्राओं का आशय लेते हैं अथवा उनका उपभोग करते हैं वे भ्रष्टकर्मा हैं।

और ‘हंस: सोऽहं’ स्वरूप शिव-शक्ति का परम कृपापूर्ण सामरस्य ही पंचम मकार-मैथुन है। इस अवस्था में नेत्ररूपी पात्र से उन्मनी की पूजा की जाती है। यही पूर्ण कला है।

देवसाधक इसी की साधना करते हैं । इसमें पूजा और पूजक भाव से मुक्त होकर साधक तन्मयानन्द प्राप्त करता है तथा अन्त में स्वयंवेद्य महानन्द का लाभ करता है । अतः जहां पंचमकार समर्पण तथा सेवन का संकेत है वहां इस स्तोत्र का भावात्मक स्मरण करें

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