महर्षि पतंजलि ने अपने योग दर्शन (Patanjali Yog Darshan) के दुसरे सूत्र में लिखा है ” योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है “।

सांख्य दर्शन के अनुसार – पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।

विष्णुपुराण के अनुसार – योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।

जैन आचार्य हरिभद्र के अनुसार – मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग है।

बौद्ध धर्म के अनुसार – कुशल चितैकग्गता योगः अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।

योग-शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में जोतने, लगाने, मेल करने आदि अर्थों में हुआ है । शतपथ ब्राह्मण  तथा बृहदारण्यको- पनिषत् में भी इसका प्रयोग कुछ ऐसे ही अर्थों में हुआ है। इससे युज्य-शब्द भी बना है, जो छांदोग्य, बृहदारण्यकादि उपनिषदों तथा शतपथ ब्राह्मण में भी आया है।

कठोपनिषत् के देखने से ज्ञात होता है कि पहले योग-शब्द रथ के घोड़ों को वश में रखने के अर्थ में आया, फिर उसका प्रयोग इंद्रियों को वश में करने के अर्थ में हो गया।

पाणिनि के मतानुसार युज् धातु से योग-शब्द का अर्थ ध्यान अथवा समाधि है- ‘युज् समाधौ’ । युजिर् धातु से योग-शब्द का अर्थ जोड़ना, संबंध करना, मिलाना आदि हैं। युज् धातु पहले अर्थ में क्रिया के रूप में बहुत कम आती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के ४८वें श्लोक में योग का अर्थ समत्व है अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार तक केवल देह के घटकों में समाहित शक्ति केंद्रों को जाग्रत करने का ज्ञान है। धारणा, ध्यान और समाधि अंतर्मन में निहित बिंदुओं को संयमित कर दिव्यता की ओर जाने का विज्ञान है। वस्तुतः योग-दर्शन ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ के चारों ओर ही परिक्रमायित है।

वास्तव में योग का अर्थ ध्यान या समाधि है। कुछ लोगों के मत में ईश्वर और जीव का मेल ही योग है।